विष्णु सरकार ने बढ़ाया किसानों का मान, खेती-किसानी को मिला नया संबल

– हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, परंपरा और आस्था का जीवंत पर्व
रायपुर, 10 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और कृषि आधारित जीवनशैली से है। यहां खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। यही वजह है कि हरेली तिहार छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण लोक पर्वों में शामिल है। यह पर्व प्रकृति, कृषि, पशुधन और किसान जीवन के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है।
प्रदेश सरकार गांव, गरीब और किसान को अपनी प्राथमिकता में रखते हुए किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में पिछले ढाई वर्षों में किसानों के हित में लिए गए कई नीतिगत फैसलों से खेती-किसानी को नया संबल मिला है।
बीते खरीफ विपणन वर्ष में प्रदेश में किसानों से समर्थन मूल्य पर 141.05 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की गई। वहीं पंजीकृत किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदी की गई। इसके साथ ही पूर्ववर्ती सरकार के दो वर्षों के बकाया धान बोनस की राशि 3716.38 करोड़ रुपये किसानों के खातों में अंतरित की गई। इन फैसलों से किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिली है।
मुख्यमंत्री का मानना है कि भारत गांवों में बसता है। जब किसान खुशहाल होगा तो गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और इसका सकारात्मक प्रभाव व्यापार तथा उद्योग पर भी पड़ेगा।
हरेली में दिखती है छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू
सावन माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला हरेली पर्व छत्तीसगढ़ का पहला प्रमुख लोक पर्व माना जाता है। हरेली का सीधा संबंध हरियाली से है। वर्षा ऋतु में जब धरती हरे रंग की चादर ओढ़ लेती है और खेत-खलिहान हरियाली से भर जाते हैं, तब किसान प्रकृति और अपनी खेती के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हरेली मनाते हैं।
इस दिन किसान अपने कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। हल, नांगर, कुदाली, फावड़ा, गैती, टंगिया, बसुला, दतारी सहित खेती में उपयोग होने वाले औजारों को साफ कर पूजा के लिए सजाया जाता है। घरों में गुड़हा चीला और गुलगुल भजिया जैसे पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए जाते हैं और कृषि उपकरणों को इनका भोग लगाया जाता है।
पशुधन की पूजा और वनौषधि खिलाने की परंपरा
हरेली केवल खेती-किसानी का पर्व नहीं, बल्कि पशुधन के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भी दिन है। किसान अपने गाय, बैल और बछड़ों को नहलाकर उनकी पूजा करते हैं।
पारंपरिक रूप से पशुओं को रोगों से बचाने के लिए औषधियुक्त आटे की लोंदी खिलाई जाती है। यादव समाज के लोग वनांचल से कंद-मूल और जड़ी-बूटियां लाकर पशुओं के लिए वनौषधि उपलब्ध कराते हैं। कई गांवों में जड़ी-बूटियों को उबालकर किसानों को देने की परंपरा रही है। इसके बदले किसान चावल, दाल आदि देकर उनका सम्मान करते हैं।
यह परंपरा गांवों में मौजूद आपसी सहयोग, सामाजिक समरसता और लोकज्ञान की मिसाल है।
गेड़ी के बिना अधूरा है हरेली का उल्लास
हरेली और गेड़ी का रिश्ता बेहद खास है। ग्रामीण अंचलों में हरेली के दिन बच्चे और युवा सुबह से ही गेड़ी चढ़कर उत्सव का आनंद लेते हैं।
बांस से बनाई जाने वाली गेड़ी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की पहचान बन चुकी है। दो लंबे बांसों में निश्चित दूरी पर कील लगाकर पैर रखने के लिए पउआ बनाया जाता है। गेड़ी पर चलते समय निकलने वाली रच-रच की आवाज हरेली के उत्सव में अलग ही रंग भर देती है।
कभी बारिश के मौसम में गांवों की गलियां कीचड़ से भर जाती थीं और बच्चे गेड़ी पर सवार होकर गलियों में घूमते थे। आज गांवों में सड़कों और गलियों के कांक्रीटीकरण से भले ही कीचड़ की समस्या कम हो गई हो, लेकिन गेड़ी की परंपरा आज भी हरेली के उत्साह को जीवंत रखे हुए है।
ठाकुरदेव की पूजा से लेकर नीम की डाली तक
हरेली के दिन गांव के गुड़ी में ठाकुरदेव की पूजा की जाती है और नारियल अर्पित किया जाता है। ग्रामीण परिवार अपने-अपने आराध्य देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।
पारंपरिक रूप से गांव के पौनी-पसारी समुदाय के राऊत, लोहार और बैगा आदि लोगों के घरों के दरवाजे पर नीम की डाली लगाते हैं। लोहार द्वारा चौखट में कील लगाने की परंपरा भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज तक कायम है। इन परंपराओं के पीछे लोकविश्वास और अनिष्ट से रक्षा की कामना जुड़ी हुई है।
लोक खेल और व्यंजनों से सजता है त्योहार
हरेली के दिन घरों में तरह-तरह के पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए जाते हैं। गुड़हा चीला, गुलगुल भजिया जैसे पकवान त्योहार की मिठास बढ़ाते हैं।
शाम होते ही गांवों में उत्सव का रंग और गहरा हो जाता है। बच्चे और युवा नारियल फेंक, कबड्डी सहित विभिन्न पारंपरिक खेलों में हिस्सा लेते हैं। बहू-बेटियां नए वस्त्र पहनकर सावन झूला, बिल्लस, खो-खो और फुगड़ी जैसे खेलों का आनंद लेती हैं।
सिर्फ पर्व नहीं, सामाजिक समरसता का संदेश
हरेली तिहार केवल धार्मिक अथवा कृषि पर्व नहीं है। यह प्रकृति, किसान, पशुधन और समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने वाला लोकपर्व है।
इस दिन पूरा गांव मिलकर उत्सव मनाता है। परिवार सुख-समृद्धि की कामना करता है और किसान अपनी खेती, प्रकृति तथा पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करता है।
हरेली हमें यह संदेश देती है कि कृषि केवल खेत में उगने वाली फसल नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और सामूहिक जीवन की जड़ है। यही कारण है कि बदलते समय के बावजूद छत्तीसगढ़ की धरती पर हरेली का उत्साह आज भी उतना ही जीवंत है।
